Resolution Ias By Er Neelesh Tomar
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भारतीय रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI ) एवं मौद्रिक नीति
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RBI की स्थापना RBI Act 1934 के तहत 1 अप्रैल 1935 को की गयी तथा 1 जनबरी 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया
RBI के कार्य
- बैंको के बैंक के रूप में कार्य करना
- सरकार के बैंक के रूप में कार्य करना
- मौद्रिक नीति को नियंत्रित करना
- मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करना
- मुद्रा के मूल्य को संतुलित करने के लिए हस्तक्षेप करना
RBI मुद्रा के मूल्य को नियंत्रित करने के लिये तीन तरीके से काम करता है
- मात्रात्मक नियंत्रण
- गुणात्मक नियंत्रण
- खुले बाजार की क्रियाये
मात्रात्मक नियंत्रण - के लिए RBI द्वारा कई प्रकार की ब्याज दरों और नीतिगत दरों का प्रयोग किया जाता है।
जैसे CRR ;SLR ;Bank rate ;Repo rate ;Reverse Repo rate आदि
गुणात्मक नियंत्रण - के लिए RBI द्वारा नैतिक दबाब ;दिशानिर्देश ;प्रचार जैसे माध्यमों का प्रयोग किया जाता है
खुले बाजार की क्रियाये -के अंतगर्त RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूति का क्रय -बिक्रय किया जाता है।
जब बाजार में मुद्रा का प्रवाह अधिक हो जाता है। तो उस स्थिति में RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूति को बाजार में बेचा जाता है। इससे बाजार में उपलब्ध मुद्रा RBI के पास चली जाती है। और दुसरी तरफ जब मुद्रा की उपलब्धता कम हो कम हो जाती है तो RBI द्वारा अपनी बेची गई प्रतिभूति को दोबारा खरीदा जाता है। और इससे बाजार में मुद्रा का प्रवाह बढ़ जाता है।
CRR (Cash Reserve Ratio ) नगद आरक्षित अनुपात - यह बैंको की कुल जमा राशि का वह हिस्सा होता है। जिसे RBI के पास रिज़र्व के रूप में सदैव रखना होता है। जब CRR को बड़ा दिया जाता है तो बैंको के पास लोगो को देने के लिए पैसे की उपलब्धता कम हो जाती है। और जब इसे घटा दिया जाता है। तो बैंको के पास धन की उपलब्धता अधिक हो जाती है। इसके लिए कोई ब्याज नहीं मिलता यह मुख्य रूप से सुरक्षा के लिए रखा जाता है।
SLR (Statutory Liquidity Ratio ) वैधानिक तरलता अनुपात - यह बैंको की कुल जमा राशि का वह हिस्सा होता है। जिसे बैंक को सदैव अपने पास रिज़र्व करके रखना होता है। आरंभ में यह नगद या सोना ;विदेशी मुद्रा या सरकारी प्रतिभूति किसी रूप में रखा जा सकता था। किंतु धीरे -धीरे इसे सरकारी प्रतिभूति के रूप में बदल कर रखना होता है। SLR को बढ़ाने व घटाने से वही असर पड़ता है जो CRR से पड़ता है।
BANK Rate -यह एक ब्याज दर है जिस दर पर RBI अंन्य बैंको को दीर्घकालीन लोन देता है। इसको बड़ा देने पर बैंको को मिलने वाला कर्ज महँगा हो जाता है फिर बैंक भी लोगों को देने वाले कर्ज पर ब्याज बड़ा देते है। इस प्रकार बाजार में मुद्रा का प्रवाह कम हो जाता है। यदि इसको घटा दिया जाता है तो कर्ज सस्ता हो जाता है जिससे लोगों के द्वारा सस्ते कर्ज की माँग बढ़ जाती है। और इस कारण बाजार में मुद्रा का प्रवाह बढ़ जाता है।
Repo Rate -यह भी एक ब्याज दर है जिस दर पर RBI अन्य बैंको को अल्पकालीन ऋण देता है इसको भी बड़ाने या घटाने का वही प्रभाव होता है जो बैंक रेट को बढ़ाने -घटाने से होता है।
Reverse Repo Rate - यह भी एक ब्याज दर है। जिस दर पर RBI अन्य बैंको से लोन लेता है। इसको बड़ा देने पर बैंक अपना पैसा बाजार में देने की बजाय RBI के पास रखने लगते है। इस प्रकार बाजार में मुद्रा का प्रवाह कम हो हो जाता है।
MSF ( Margining Standing Facility )-यह सुबिधा 2011 से बैंको को दी गयी है। इसके अंतगर्त कोई बैंक विशेष जरुरत पड़ने पर एक दिन के लिए RBI से कुछ अतिरिक्त ब्याज देकर अपने कुल जमा कोष के 2 % के बराबर धन ऋण के रूप में प्राप्त कर सकता है।
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