Resolution Ias By Er Neelesh Tomar
सुभाष चन्द्र बोस एवं आजाद हिन्द फौज
1942 से 1945 के मध्य देश के बाहर भारतीय स्वन्त्रता की गूंज सुनायी पड़ी इस आंदोलन के नायक सुभाषचन्द्र बोस थे वे प्रारंभ में कांग्रेस दल के सदस्य थे। 1939 में गाँधीजी के विरोध के बावजूद भी कांगेस के अध्यक्ष चुने गए। बाद में कांग्रेस छोड़कर फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की और क्रांतिकारी भावना का प्रचार करने लगे। गुप्त रूप से भारत छोड़कर बर्लिन व वहां से जापान पहुंचे
इसी बीच रासबिहारी बोस की पहल पर कैप्टन मोहन सिंह ने ब्रिटिश सेना के उन भारतीय सैनिको को जिन्हें जापानियों ने पकड़ लिया था मिलाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सेना में नई जान फूंकी एवं नेताजी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
23 अक्टूबर को आजाद हिन्द फौज सेनापति की हैसियत से भारत की अस्थाई सरकार सिंगापुर में बनाई तथा देश को स्वतंत्र करने के लिए रक्त की आखिरी बूँद बहा देने की शपथ ली। 1944 में आजाद हिन्द फौज भारत की पूर्वी सीमा तक पहुँचने में सफल रही। 1944 में कोहिमा में भारतीय झण्डा फहराया इसके पश्चात इम्फाल को घेर लिया। लेकिन वर्षा की अधिकता और रसद की कमी के कारण उन्हें बाध्य होकर लौटना पड़ा। नेताजी ने नारा दिया तुम मुझे खून दो में तुम्हे आजादी दूंगा
1944 में विश्व की राजनीति में जापान की स्थिति कमजोर हो गयी अत: आजाद हिन्द फौज भी बिखरने लगी सुभाष चन्द्र बोस बैंकाक वापस आ रहे थे 1945 में हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी तथापि उनकी मृत्यु के संबंध में विवाद है।
आजाद हिन्द फौज के सेनापति कर्नल शहनवाज खां ,कैप्टन प्रेमकुमार सहगल ,गुरुबख्श सिंह पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया परन्तु जनमत के दबाब के कारण सजा नहीं दी जा सकी।
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