Resolution Ias By Er Neelesh Tomar
भक्ति आन्दोलन के संत
रामानुजाचार्य
(11वी शताव्दी ) इन्होने राम को अपना आराध्य माना। इनका जन्म मद्रास के निकट पेरुम्बर नामक स्थान पर हुआ रामानुज ने वेदांत में प्रशिक्षण अपने गुरु काँचीपुरम के यादव प्रकाश से प्राप्त किया था।
रामानंद
का जन्म प्रयाग में हुआ था। इनकी शिक्षा प्रयाग तथा वाराणसी में हुई। इन्होने अपना सम्प्रदाय सभी जातियों के लिए खोल दिया रामानुज की भाँति इन्होने भी भक्ति को मोक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार किया। इन्होने मर्यादा पुरषोत्तम राम एवं सीता की आराधना को समाज के समक्ष रखा इनके प्रमुख शिष्य थे रैदास (हरिजन ) कबीर (जुलाहा ),धन्ना (जाट ) आदि
कबीर
का जन्म 1445 ई. में एक विधवा ब्राहम्णी के गर्भ से हुआ था। लोक -लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तालाब के समीप छोड़ दिया। जुलाहा नीरू तथा उसकी पत्नी नीमा इस नवजात शिशु को अपने घर ले आये इस बालक का नाम कबीर रखा गया इन्होने राम ,रहीम ,हजरत ,अल्लाह आदि को एक हीं ईश्वर के अनेक रूप माने। इन्होने जाति प्रथा ,धार्मिक कर्मकांड ,बाह्य आडम्बर ,मूर्ती पूजा ,जप -तप ,अवतारवाद आदि का घोर विरोध करते हुए एकेश्वरवाद में आस्था व्यक्त की एवं निराकार ब्रह्म की उपासना को महत्व दिया निर्गुण भक्ति धारा से जुड़े कबीर ऐसे प्रथम भक्त थे। जिन्होंने संत होने के बाद भी पूर्णता:गृहस्थ जीवन का निर्वाह किया। कबीर के उपदेश सबद सिक्खो के आदिग्रन्थ में संगृहीत है।
गुरु नानक
का जन्म 1469 ई.अविभाजित पंजाब के तलवण्डी नामक स्थान पर हुआ था जो अब ननकाना साहिब नाम से विख्यात है। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा पिता का नाम कालूराम था। बटाला के मूलराज खत्री की बेटी सूलषनी से उनका विवाह हुआ। उन्होंने देश का पांच बार चक्कर लगाया जिसे उदासीस कहा जाता है। उन्होंने कीर्तनो के माध्यम से उपदेश दिए। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में अपना देहरा (मठ ) स्थापित किया अपने जीवन काल में ही उन्होंने आध्यात्मिक आधार पर अपने पुत्रो की जगह अपने शिष्य भाई लहना (अंगद ) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया इनकी मृत्यु करतारपुर में हुई नानक ने सिक्ख धर्म की स्थापना की नानक सूफी संत बाबा फरीद से प्रभावित थे।
गोस्वामी तुलसीदास
इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गांव में 1554 ई. में हुआ था इन्होने रामचरित मानस की रचना की
रैदास
ये जाति से हरिजन थे। ये रामानंद के 12 शिष्यों में एक थे। इनके पिता का नाम रघु तथा माता का नाम घुरबीनिया था। ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे। मीराबाई ने इन्हे अपना गुरु माना है।
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