गरीबी,गरीबी के प्रकार तथा गरीबी का मापन

 Resolution Ias By Er Neelesh Tomar

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गरीबी,गरीबी के प्रकार तथा गरीबी का मापन 

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गरीबी एक ऐसी स्थिति है। जिसमे कोई व्यक्ति अपने लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती भी नहीं कर पाता 

अर्थशास्त्र के पिता एडम स्मिथ ने एक बार कहा था कि कोई समाज कभी सुखी एवं सम्पन्न नहीं हो सकता जिसके अधिकांश सदस्य निर्धन व गरीब हो। 

गरीबी दो प्रकार की होती है। 

  1. निरपेक्ष गरीबी 
  2. सापेक्षिक गरीबी 
निरपेक्ष गरीबी - एक निश्चित गरीबी रेखा के आधार पर मापी गयी गरीबी होती है। जितने लोग उस गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर -बसर कर रहे होते है। उन सब को निरपेक्ष रूप से गरीब कहा जाता है। 
यह प्रतिमान न्यूनतम आय या उपभोक्ता स्तर पर आधारित है। इसे Head Count Method भी कहते है। भारत में इसी निरपेक्ष माप को निर्धनता के आंकलन हेतु अपनाया जाता है। 

सापेक्षिक गरीबी - इसमें आय के बितरण की बिषमता को दिखती है। यदि कुछ लोगों का जीवन स्तर एक समान्य औसत से बहुत ऊपर हो तथा बाकी और लोगों का जीवन स्तर बहुत नीचे हो तो उसे सापेक्षिक गरीबी की स्थिति कहते है। दूसरे शव्दो में 
देश की आय का एक बड़ा हिस्सा कुछ ही लोगो के हाथ में जाता हो जबकि शेष लोगों के पास आय का बहुत कम हिस्सा जाता हो तो इस स्थिति का सापेक्षिक गरीबी की स्थिति कहा जाता है। 

सापेक्ष गरीबी के निर्धारण के संबंध में लारेंज ने एक वक्र का निर्माण किया है। जिसे लारेंज वक्र कहा जाता है। इसमें यदि अक्ष पर जनसंख्या का प्रतिशत  तथा y अक्ष पर आय का प्रतिशत दिखाया जाता है। यदि एक निश्चित प्रतिशत जनसंख्या के पास आय का उतना ही प्रतिशत हिस्सा पहुँचता हो तो ऐसी स्थिति में यह वक्र x अक्ष से 45' का कोण बनाते हुए सीधी निकल जाती है। इसे पूर्ण समता रेखा कहा जाता है किन्तु जैसे -जैसे बितरण की बिषमता बड़ती जाती है अर्थात कम लोगो के पास आय का बड़ा हिस्सा पहुँचता है। तथा ज्यादा लोगों के पास आय का कम हिस्सा पहुँचता है तो ऐसी स्थिति में वक्र पूर्ण समता रेखा से नीचे गुजरने लगती है अर्थात x अक्ष के नजदीक आने लगती है। यह वक्र पूर्ण समता रेखा से जितनी दूर होती जाएगी इसका अर्थ है कि बिषमता उतनी ज्यादा बड़ती जाएगी 

गिनी गुणांक - गिनी ने लारेंज वक्र को आधार बनाकर इसे गणितीय रूप में व्यक्त किया इसे ही गिनी गुणांक कहा जाता है। गिनी गुणांक का मान 0 से 1 के बीच में विचरण करता है इसका मान यदि 0 है तो इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में पूर्ण समता है। यदि 1 है तो इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में पूर्ण बिषमता है। पूर्ण समता का अर्थ है कि सभी लोगों के पास आय का बराबर हिस्सा पहुंचे तथा पूर्ण बिषमता का अर्थ है कि एक ही लोग के पास देश की पूरी आय पहुँच रही है। किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए इसका मान 0 या 1 नहीं हो सकता इसका मान 0 के जितने नजदीक होगा अर्थव्यवस्था में बिषमता उतनी कम होगी यदि 0 से 1 की ओर जितना बड़ता जायेगा बिषमता उतनी अधिक होती जाएगी 

गरीबी के पैमाने का निर्धारण 

आजादी के बाद योजना आयोग के द्वारा बिना किसी निश्चित सूत्र से गरीबी का निर्धारण किया जाता था आगे चलकर 1971 में रथ और दांडेकर के द्वारा गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए कैलोरी खपत को आधार बनाया गया जिसमे शहरी क्षेत्र के लिए प्रति व्यक्ति 2100 कैलोरी तथा ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रति व्यक्ति 2400 कैलोरी ऊर्जा के लिए आवश्यक भोजन की कीमत को गरीबी का पैमाना माना गया 
इसके बाद इस पैमाने में सुधार करने के लिए सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया इस समिति ने 2009 में अपनी रिपोर्ट दी इस समिति ने भोजन के साथ -साथ अन्य वस्तुओं (जरूरी) को गरीबी के पैमाने में शामिल किया शिक्षा ,स्वास्थ ,आवास ,स्वच्छता आदि और इस आधार पर गरीबी निर्धारण का नया सूत्र बनाया गया वर्तमान में इसी सूत्र के आधार पर गरीबी का निर्धारण किया जा रहा है। 
सबसे ऊँचा पैमाना नागालैंड के लिए सबसे कम उड़ीसा में 
  • तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट ने गरीबी पर देशव्यापी बहस को बढ़ावा दिया। अत:तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट की समीक्षा हेतु प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ० सी० रंगराजन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया गया जिसकी रिपोर्ट 2014 में सरकार को सौंपी गई। रंगराजन रिपोर्ट में गरीबी का आधार 32 रु तथा ग्रामीण तथा 47 रु नगर में प्रतिदिन व्यय को माना गया है। 
  • भारत में गरीबी का अनुमान राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) द्वारा संग्रहित आकङो पर योजना आयोग द्वारा लगाया जाता है। 
  • भारत में गरीबी रेखा की अवधारणा को सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने 1867 में अपनी पुस्तक Proverty and Unbritish Rule in India में पेश किया तथा यह सिद्ध किया कि अंग्रेजो की शोषणकारी नीतियाँ गरीबी के लिए उत्तरदायी है। नौरोजी ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की तुलना Drainage theory of wealth से किया 

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