राष्ट्रपति शासन (अनु० 356 )

 Resolution Ias By Er Neelesh Tomar

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राष्ट्रपति शासन (अनु० 356 )

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राष्ट्रपति शासन (अनु० 356 )- यदि राष्ट्रपति को किसी राज्य के राज्यपाल से प्रतिवेदन (रिपोर्ट ) मिलने पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि उस राज्य का शासन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो वह उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा कर सकता है। राष्ट्रपति द्वारा यह घोषणा किये जाने के दो माह के अंदर संसद के द्वारा इसका अनुमोदन किया जाना अनिवार्य है। एक बार संसद के अनुमोदन से इसे 6 माह के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है। किन्तु किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन अधिकतम 3 वर्ष तक लगाया जा सकता है। किन्तु एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए दो और शर्त पूरी होनी चाहिए देश के किसी भाग या पूरे देश में आपात लगा हो और दूसरा निर्वाचन आयोग यह कह दे अभी  चुनाव करना संभव नहीं है। राष्ट्रपति शासन लगने पर उस राज्य का शासन राष्ट्रपति द्वारा स्वंय या अपने किसी प्रतिनिधि के द्वारा चलाया जाता है। 

  • राष्ट्रपति शासन लागू होने की दशा में संबंधित राज्य की कार्यपालिका की शक्तियों पर राष्ट्रपति के नियंत्रण का विस्तार हो जाता है किन्तु उच्च न्यायलय में निहित किसी शक्ति को वह अपने हाथ में नहीं ले सकता 
  • प्रथम राष्ट्रपति शासन 1951 में पंजाब में लगाया गया 
  • सर्वाधिक राष्ट्रपति शासन मणिपुर में लगाया गया 
  • अनु० 356 न्यायिक समीक्षा के अधीन है। 

आजादी के बाद अनु० 356 लगभग 126 बार प्रयोग तथा प्राय: कई बार केन्द्र द्वारा विरोधी सरकारों के विरुद्ध हथियार के रूप में प्रयोग ने इसे विवादित बना दिया है। संविधान के उद्देश्य (संवैधानिक तंत्र की विफलता ) तथा सुप्रीम कोर्ट के S. R. बोम्बई केस (1994 ,सदन में ही शक्ति परीक्षण जरूरी ) के आदेश निष्प्रभावी हो चुके है। इस प्रकार के मामले संघीय संरचना एवं लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करते है। तथा गैर जरूरी न्यायिक विवाद को भी बढ़ावा देते है। 

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