Resolution Ias By Er Neelesh Tomar
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संवैधानिक उपचारो का अधिकार अनु० 32
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अनु० 32 - को अम्बेडकर जी ने संविधान की आत्मा कहा इसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति के मूलाधिकार के हनन के मामले में उच्चतम न्यायलय को यह अधिकार है कि वह निम्नलिखित 5 प्रकार की writ जारी कर सकता है।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण - यदि किसी व्यक्ति को बिना किसी उचित आधार पर गिरफ्तार किया गया है तो न्यायलय यह आदेश दे सकता है कि उस व्यक्ति को सशरीर न्यायलय के सामने प्रस्तुत किया जाये
- परमादेश - यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन उचित तरीके से नहीं कर रहा है तो न्यायलय यह writ जारी कर करता है। कि वह व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन ठीक से करे
- प्रतिषेध - यह रिट सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अन्य न्यायलयों के विरुद्ध जारी की जाती है। यदि वह न्यायलय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लेता है तो उस निर्णय को रोक दिया जाता है।
- उत्प्रेषण - यह writ भी न्यायिक अधिकारियो के विरुद्ध जारी ही जारी की जाती है इसको तब जारी किया जाता है जब नीचे के न्यायपालिका द्वारा मामले की सुनबायी में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायलय मामले की सुनवायी को रोककर उस मामले को अपने पास माँगा लेता है।
- अधिकार पृच्छा - इस writ में न्यायलय के द्वारा किसी भी व्यक्ति के किसी पद से संबंधित दावे के बारे में प्रश्न करता है कि किस अधिकार से आपने उस पद का दावा किया
Note -
- प्रतिषेध के अंतगर्त याचिका तब जारी की जाती है जब मामला न्यायलय में विचाराधीन हो जबकि उत्प्रेषण को अंतिम आदेश के पारित होने के बाद इसे कोर्ट द्वारा जारी किया जाता है।
- अनु० 32 के अंतर्गत व्यक्ति मौलिक अधिकारों के हनन की अवस्था में न्यायलय की शरण ले सकता है। इसलिए अंबेडकर जी ने इस अनु०32 को संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद बताया
- मौलिक अधिकारों के हनन होने पर सुप्रीम कोर्ट को अनु० 32 के तहत तथा हाईकोर्ट को अनु० 226 के अंतर्गत इन पर सुनवाई का अधिकार है।


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