राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज


                                Resolution ias By Er Neelesh Tomar

राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज 

उन्नीसवी शताब्दी में धार्मिक एवं समाज सुधार आंदोलनों का भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। अनेक कारणों से भारत में धर्म एवं समाज में परिवर्तन प्रारंभ हुआ ,इसे पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है। भारत के सामाजिक जीवन में अनेक कुरीतियां आ गई थी जैसे छुआछूत ,सती प्रथा ,दलितों की दुर्दशा ,बलि प्रथा ,मधपान आदि जिनके कारण भारतीय समाज पतन के द्वार पर खड़ा था। ऐसी स्थति में प्रबुद्ध भारतीयों ने इसमें सुधार लाने के लिए आंदोलन प्रारम्भ किये। 

राजा राममोहन राय -
                 राजा राममोहन राय भारतीय राष्ट्रीयता के अग्रदूत कहे जाते है। उन्हें भारत के सुधार आंदोलनों का जनक भी कहा जाता है। 19 वी शताब्दी के सुधार आन्दोलनों में उनके विचारो का व्यापक प्रभाव था। 20 अगस्त 1828 को राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की। इसके सदस्य शनिवार को सायंकाल एकत्र होकर उपनिषदों का वाचन करते थे। उन्होंने विभिन्न धर्मो के साहित्य पढ़कर निष्कर्ष निकला की सभी धर्मो में एकेश्वरवादी अंश समान है। वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे। उन्होंने बांगला ,हिंदी ,संस्कृत ,फ़ारसी तथा अंग्रेजी में अनेक ग्रंथो की रचना की और बांगला और फ़ारसी में दो समाचार पत्र प्रारंभ किये उन्होंने सती प्रथा का कड़ा विरोध किया। वे विधवा विवाह तथा सभी के लिए शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। वे जाति प्रथा के कड़े विरोधी थे। वे संपूर्ण मानव जाति के लिए स्वतंत्रता चाहते थे। वे एक महान शिक्षा शास्त्री थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने पश्चिमी शिक्षा का समर्थन किया। उनके प्रयासों के कारण विलियम बेंटिक ने 1829 में सती प्रथा पर रोक लगा दी तथा कानून बनाकर सती प्रथा को अपराध घोषित किया। 1833 में उनका देहावसान हो गया 


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